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Wednesday, 19 September 2018

Munawwar Rana Complete Book Maa - A Heart Touching Poems Collection..

Munawwar Rana Complete Book Maa - A Heart Touching Poems Collection
पुस्तक   : माँ
लेखक     : मुनव्वर राना
मूल्य      : 25
प्रकाशक : वाली अस्सी अकादमी,8-फर्स्ट                         फ्लोर,एफआई! ढिंगरा अपार्टमेंट,
                 लखनऊ-226001, 
                 उत्तर प्रदेश,  भारत !

अपनी बात

शब्दकोशों के मुताबिक ग़ज़ल का मतलब महबूब से बातें करना है ! अगर इसे सच मान लिया जाए तो फिर महबूब “माँ” क्यों नहीं हो सकती ! मेरी शायरी पर मुद्दतों, बल्कि अब तक ज्यादा पढ़े-लिखे लोग Emotional Blackmaling का इल्ज़ाम लगाते रहे हैं। अगर इस इल्ज़ाम को सही मान लिया जाए तो फिर महबूब के हुस्न, उसके जिस्म, उसके शबाब, उसके रुख व रुख़सार, उसे होंठ, उसके जोबन और उसकी कमर की पैमाइश को अय्याशी क्यों नहीं कहा जाता है !
अगर मेरे शेर Emotional Blackmaling हैं तो श्रवण कुमार की फरमां-बरदारी को ये नाम क्यों नहीं दिया गया? जन्नत माँ के पैरों के नीचे है, इसे गलत क्यों नहीं कहा गया? मैं पूरी ईमानदारी से इस बात का तहरीरी इकरार करता हूँ कि मैं दुनिया के सबसे मुक़द्दस और अज़ीम रिश्ते का प्रचार सिर्फ़ इसलिए करता हूँ कि अगर मेरे शेर पढ़कर कोई भी बेटा “माँ” की ख़िदमत और ख़याल करने लगे, रिश्तों का एहतेराम करने लगे तो शायद इसके बदले में मेरे कुछ गुनाहों का बोझ हल्का हो जाए।
ये किताब भी आपकी ख़िदमत तक सिर्फ़ इसलिए पहुँचाना चाहता हूँ कि आप मेरी इस छोटी-सी कोशिश के गवाह बन सकें और मुझे भी अपनी दुआओं में शामिल करते रहें।
ज़रा-सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाये, 
दिये से मेरी “माँ” मेरे लिए काजल बनाती है !
इस किताब की बिक्री से हासिल की गई तमाम आमदनी “माँ फ़ाउण्डेशन” की ओर से ज़रूरतमन्दों की इमदाद के लिए ख़र्च की जाएगी ! --मुनव्वर राना

तमाम उम्र ये झूला नहीं उतरता है

मेरी माँ बताती है कि बचपन में मुझे सूखे की बीमारी थी, माँ को यह बताने की ज़रूरत क्या है..? मुझे तो मालूम ही है कि मुझे कुछ-न-कुछ बीमारी ज़रूर है क्योंकि आज तक मैं बीमार सा हूँ ! दरअस्ल मेरा जिस्म बीमारी से रिश्तेदारी निभाने में हमेशा पेशपेश रहा है ! शायद इसी सूखे का असर है कि आज तक मेरी ज़िन्दगी का हर कुआँ खुश्क है.. आरजू का, दोस्ती का, मोहब्बत का, वफ़ादारी का ! 
माँ कहती है बचपन में मुझे हँसी बहुत आती थी.. हँसता तो मैं आज भी हूँ लेकिन सिर्फ़ अपनी बेबसी पर, अपनी नाकामी पर, अपनी मजबूरियों पर और अपनी तनहाई पर.. लेकिन शायद यह हँसी नहीं है, मेरे आँसुओं की बिगड़ी हुई तस्वीर है, मेरे अहसास की भटकती हुई आत्मा है ! मेरी हँसी “इंशा” की खोखली हँसी, “मीर” की ख़ामोश उदासी और “ग़ालिब” के जिद्दी फक्कड़पन से बहुत मिलती-जुलती है !
मेरे हँसी तो मेरे ग़मों का लिबास है,
लेकिन ज़माना इतना कहाँ ग़म-शनास है !
पैवन्द की तरह चमकती हुई रौशनी, रौशनी में नज़र आते हुए बुझे-बुझे चेहरे, चेहरों पर लिखी दास्तानें, दास्तानों में छुपा हुआ माज़ी, माज़ी में छुपा हुआ मेरा बचपन, जुगनुओं को चुनता हुआ बचपन, तितलियों को पकड़ता हुआ बचपन, पे़ड़ की शाखों से झूलता हुआ बचपन, खिलौनों की दुकानों को ताकता हुआ बचपन, बाप की गोद में हँसता हुआ बचपन, माँ की आगोश में मुस्कुराता हुआ बचपन, मस्जिदों में नमाज़ें पढ़ता हुआ बचपन, मदरसों में सिपारे रटता हुआ बचपन, झील में तैरता हुआ बचपन, धूल-मिट्टी से सँवरता हुआ बचपन, नन्हें-नन्हें हाथों से दुआएँ माँगता हुआ बचपन, गुल्ले से निशाने लगाता हुआ बचपन, पतंग की डोर में उलझा हुआ बचपन, नींद में चौंकता हुआ बचपन, ख़ुदा जाने किन भूल-भुलैयों में खोकर रह गया है, कौन संगदिल इन सुनहरे दिनों को मुझसे छीनकर ले गया है, नदी के किनारे बालू से घरौंदे बनाने के दिन कहाँ खो गए, रेत भी मौजूद है, नदी भी नागिनों की तरह बल खा कर गुज़रती है लेकिन मेरे यह हाथ जो महल तामीर कर सकते हैं, अब घरौंदे क्यों नहीं बना पाते, क्या पराँठे रोटियों की लज़्ज़त छीन लेते हैं, क्या पस्ती को बलन्दी अपने पास नहीं बैठने देती, क्या अमीरी, ग़रीबी का ज़ायक़ा नहीं पहचानती, क्या जवानी बचपन को क़त्ल कर देती है..?
मई और जून की तेज़ धूप में माँ चीखती रहती थी और बचपन पेड की शाखों पर झूला करता था, क्या धूप चाँदनी से ज्यादा हसीन होती है, माचिस की ख़ाली डिबियों से बनी रेलगाड़ी की पटरियाँ चुराकर कौन ले गया, काश कोई मुझसे कारों का ये क़ाफ़िला ले ले, और इसके बदले में मेरी वही छुक-छुक करती हुई रेलगाड़ी मुझे दे दे, क्योंकि लोहे और स्टील की बनी हुई गाड़ियाँ वहाँ नहीं रुकतीं जहाँ भोली-भाली ख़्वाहिशें मुसाफ़िरों की तरह इन्तिजार करती हैं, जहाँ मासूम तमन्नाएँ नन्हें-नन्हें होठों से बजने वाली सीटियों पर कान लगाए रहती हैं !

कोई मुझे मेरे घर के सामने वाला कुआँ वापस ला दे जो मेरी माँ की तरह ख़ामोश और पाक रहता था, मेरी मौसी जब मुझे अपने गाँव लेकर चली जातीं तो माँ ख़ौफज़दा हो जाती थी क्योंकि मैं सोते में चलने का आदी था, माँ डरती थी कि मैं कहीं आँगन में कुएँ में न गिर पड़ूँ, माँ रात भर रो-रोकर कुएँ के पानी  से कहती रहती कि, ऐ पानी ! मेरे बेटे को डूबने मत देना, माँ समझती थी कि शायद पानी से पानी का रिश्ता होता है, मेरे घर का कुआँ बहुत हस्सास था, माँ जितनी देर कुएँ से बातें करती थी कुआँ अपने उबलते हुए पानी को पुरसुकूत रहने का हुक्म देता था, शायद वह मेरी माँ की भोली-भाली ख्वाहिशों की आहट को एहतेराम से सुनना चाहता था ! पता नहीं यह पाकीज़गी और ख़ामोशी माँ से कुएँ ने सीखी थी या कुएँ से माँ ने..?

गर्मियों की धूप में जब टूटे हुए एक छप्पर के नीचे माँ लू और धूप से टाट के पर्दों के ज़रिए मुझे बचाने की कोशिश करती तो मुझे अपने आँगन में दाना चुगते हुए चूज़े बहुत अच्छे लगते जिन्हें उनकी माँ हर खतरे से बचाने के लिए अपने नाजुक परों में छुपा लेती थी ! माँ की मुहब्बत के आँचल ने मुझे तो हमेशा महफूज रखा लेकिन गरीबी के तेज झक्कड़ों ने माँ के खूबसूरत चेहरे को झुलसा-झुलसा कर साँवला कर दिया ! घर के कच्चे आँगन से उड़ने वाली परेशानी की धूल ने मेरी माँ का रंग मटमैला कर दिया ! दादी भी मुझे बहुत चाहती थी ! वह हर वक़्त मुझे ही तका करती, शायद वह मेरे भोले-भाले चेहरे में अपने उस बेटे को तलाश करती थी जो ट्रक ड्राइवर की सीट पर बैठा हुआ शेरशाह सूरी के बनाए हुए रास्तों पर हमेशा गर्मेसफ़र रहता था !!

इस किताब में जनाब मुनव्वर राना ने अपने 300 से भी अधिक शेर का संकलन किया है जो की एक औरत के  विभिन्न रूप जैसे की माँ, बहन, पत्नी, बेटी आदि पर लिखे गए है, जो की निम्न हैं..!!

Maa  माँ

Munawwar Rana Maa Part 1
Munawwar Rana Maa Part 2
Munawwar Rana Maa Part 3
Munawwar Rana Maa Part 4
Munawwar Rana Maa Part 5
Munawwar Rana Maa Part 6
Munawwar Rana Maa Part 7
Munawwar Rana Maa Part 8
Munawwar Rana Maa Part 9
Munawwar Rana Maa Part 10
Munawwar Rana Maa Part 11
Munawwar Rana Maa Part 12
Munawwar Rana Maa Part 13
Munawwar Rana Maa Part 14
Munawwar Rana Maa Part 15

Buzurg  बुजुर्ग

Munawwar Rana Maa Part 16

Khud  खुद

Munawwar Rana Maa Part 17
Munawwar Rana Maa Part 18
Munawwar Rana Maa Part 19

Bahan  बहन

Munawwar Rana Maa Part 20

Bhai  भाई

Munawwar Rana Maa Part 21
Munawwar Rana Maa Part 22

Bachche  बच्चे

Munawwar Rana Maa Part 23
Munawwar Rana Maa Part 24

Bahu  बहू

Munawwar Rana Maa Part 25
Munawwar Rana Maa Part 26

Vividh  विविध

Munawwar Rana Maa Part 27
Munawwar Rana Maa Part 28
Munawwar Rana Maa Part 29

Gurbat  ग़ुरबत

Munawwar Rana Maa Part 30

Beti  बेटी

Munawwar Rana Maa Part 31

skpoetry के पाठकों से अनुरोध है कि यदि उन्हें यह पुस्तक अच्छी लगे तो वे "माँ फ़ाउण्डेशन" के सहायतार्थ इसके प्रिंट संस्करण को भी खरीदें ! skpoetry में यह पुस्तक श्री मुनव्वर राना ने इस विचार से संकलित की है कि यह पुस्तक विश्व भर के लोगो तक पहुँच सके और लोग "माँ फ़ाउण्डेशन" के सहायतार्थ आगे आयें ! इस पुस्तक का मूल्य 25 रुपये है और पुस्तक नीचे दिये गये पते से प्राप्त की जा सकती है:- 
10-C, बोलाईदत्त स्ट्रीट, 
कोलकाता - 700073, पश्चिम बंगाल, भारत !



Munawwar Rana Maa Part 31

Gharon mein yun sayani betiyaan bechain rehati hain

Gharon mein yun sayani betiyaan bechain rehati hain,
Ki jaise saahilon par kashtiyaan bechain rehati hain.

Ye chidiya bhi meri beti se kitani milati-julti hai,
Kahin bhi shaakhe-gul dekhe to jhula daal deti hai.

Ro rahe the sab to main bhi phoot ke rone lagaa,
Warnaa mujhko betiyon ki rukhsati achchi lagi.

Badi hone ko hain ye muratein aangan mein mitti ki,
Bahut se kaam baaki hai sambhala le liya jaaye.

To phir jakar kahin Maa-Baap ko kuch chain padta hai,
Ki jab sasuraal se ghar aa ke beti muskurati hai.

Ayesa lagta hai ki jaise khtam mela ho gaya,
Uad gayi aangan se chidiyaan ghar akela ho gaya. !!

घरों में यूँ सयानी बेटियाँ बेचैन रहती हैं,
कि जैसे साहिलों पर कश्तियाँ बेचैन रहती हैं !

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती-जुलती है,
कहीं भी शाख़े-गुल देखे तो झूला डाल देती है !

रो रहे थे सब तो मैं भी फूट कर रोने लगा,
वरना मुझको बेटियों की रुख़सती अच्छी लगी !

बड़ी होने को हैं ये मूरतें आँगन में मिट्टी की,
बहुत से काम बाक़ी हैं सँभाला ले लिया जाये !

तो फिर जाकर कहीँ माँ-बाप को कुछ चैन पड़ता है,
कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है !

ऐसा लगता है कि जैसे ख़त्म मेला हो गया,
उड़ गईं आँगन से चिड़ियाँ घर अकेला हो गया !!


-- Munawwar Rana



Tuesday, 18 September 2018

Munawwar Rana Maa Part 30


Ghar ki deewar pe kauve nahi achche lagte,
Muflisi mein ye tamaashe nahi achche lagte.

Muflisi ne saare aangan mein andhera kar diya,
Bhai khaali haath laute aur Behane bujh gayi.

Amiri resham-o-kamkhwaab mein nangi nazar aayi,
Garibi shaan se ek taat ke parde mein rehati hai.

Isi gali mein wo bhukha kisaan rahata hai,
Ye wo zameen hai jahan aasmaan rahata hai.

Dehleez pe sar khole khadee hogi jarurat,
Ab ase ghar mein jana munaasib nahi hoga.

Eid ke khauf ne rozon ka maza chhin liya,
Muflisi mein ye mahina bhi bura lagtaa hai.

Apne ghar mein sar jhukaye is liye aaya hun main,
Itani majduri to bachchon ki dua khaa jayegi.

Allaah gareebon ka madadgaar hai "Rana",
Hum logon ke bachche kabhi sardi nahi khaate.

Bojh uthaana shauk kahan hai majboori ka suda hai,
Rehate-rehate station par log kuli ho jaate hain. !!

घर की दीवार पे कौवे नहीं अच्छे लगते,
मुफ़लिसी में ये तमाशे नहीं अच्छे लगते !

मुफ़लिसी ने सारे आँगन में अँधेरा कर दिया,
भाई ख़ाली हाथ लौटे और बहनें बुझ गईं !

अमीरी रेशम-ओ-कमख़्वाब में नंगी नज़र आई,
ग़रीबी शान से इक टाट के पर्दे में रहती है !

इसी गली में वो भूखा किसान रहता है,
ये वो ज़मीं है जहाँ आसमान रहता है !

दहलीज़ पे सर खोले खड़ी होगी ज़रूरत,
अब ऐसे घर में जाना मुनासिब नहीं होगा !

ईद के ख़ौफ़ ने रोज़ों का मज़ा छीन लिया,
मुफ़लिसी में ये महीना भी बुरा लगता है !

अपने घर में सर झुकाये इस लिए आया हूँ मैं,
इतनी मज़दूरी तो बच्चे की दुआ खा जायेगी !

अल्लाह ग़रीबों का मददगार है "राना",
हम लोगों के बच्चे कभी सर्दी नहीं खाते !

बोझ उठाना शौक़ कहाँ है मजबूरी का सौदा है,
रहते-रहते स्टेशन पर लोग कुली हो जाते हैं !!


-- Munawwar Rana



Munawwar Rana Maa Part 29


Wo chidiyaan thi duayein padh ke jo mujhko jagati thi,
Main aksar sochtaa tha ye tilaawat kaun karta hai.

Parinde chonch mein tinke dabaate jate hain.
Main sochtaa hun ki ab ghar basa liya jaaye.

Aye mere bhai mere khoon ka badlaa le le,
Haath mein roz ye talwaar nahi aayegi.

Naye kamron mein ye cheezein puraani kaun rakhta hai,
Parindo ke liye sheharon mein paani kaun rakhta hai.

Jisko bachchon mein pahunchane ki bahut ujalat ho,
Usse kehiye na kabhi Car chalane ke liye.

So jaate hai footpaath pe akhbaar bichha kar,
Majdoor kabhi neend ki goli nahi khaate.

Pet ki khatir phootpaathon pe bech raha hun tasvirein,
Main kya janu roza hai ya mera roza toot gaya.

Jab us se guftgu kar li to phir shazaraa nahi poonchaa,
Hunar bakhiyaagiri ka ek turpaai mein khultaa hai. !!

वो चिड़ियाँ थीं दुआएँ पढ़ के जो मुझको जगाती थीं,
मैं अक्सर सोचता था ये तिलावत कौन करता है !

परिंदे चोंच में तिनके दबाते जाते हैं,
मैं सोचता हूँ कि अब घर बसा लिया जाये !

ऐ मेरे भाई मेरे ख़ून का बदला ले ले,
हाथ में रोज़ ये तलवार नहीं आयेगी !

नये कमरों में ये चीज़ें पुरानी कौन रखता है,
परिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है !

जिसको बच्चों में पहुँचने की बहुत उजलत हो,
उससे कहिये न कभी कार चलाने के लिए !

सो जाते हैं फुट्पाथ पे अखबार बिछा कर,
मज़दूर कभी नींद की गोलॊ नहीं खते !

पेट की ख़ातिर फुटपाथों पे बेच रहा हूँ तस्वीरें,
मैं क्या जानूँ रोज़ा है या मेरा रोज़ा टूट गया !

जब उससे गुफ़्तगू कर ली तो फिर शजरा नहीं पूछा,
हुनर बख़ियागिरी का एक तुरपाई में खुलता है !!


-- Munawwar Rana



Monday, 17 September 2018

Munawwar Rana Maa Part 28


Tumhari aankhon ki tauheen hai zara socho,
Tumhara chahane wala sharaab peeta hai.

Kisi dukh ka kisi chehare se andaaza nahi hota,
Shazar to dekhne se sab hare maaloom hote hain.

Jaroorat se anaa ka bhaari patthar toot jata hai,
Magar phir aadami hi andar-andar toot jata hai.

Mohabbat ek aisa khel hai jismein mere bhai,
Hamesha jeetane wale pareshaani mein rehate hain.

Phir kabootar ki wafadaari pe shaq mat karna,
Wah to ghar ko isi meenar se pehachanta hai.

Anaa ki mohanee soorat bigaad deti hai,
Bade-badon ki jarurat bigaad deti hai.

Banakar ghaunsala rehataa tha ek joda kabootar ka,
Agar aandhi nahi aati to ye minaar bach jata.

Un gharon mein jahan mitti ke ghade rahte hain,
Kad mein chhote hon magar log bade rehate hain.

Pyaas ki shiddat se munh khole parinda gir pada,
Seedhiyon par haanfte akhbaar wale ki tarah. !!

तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो,
तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है !

किसी दुख का किसी चेहरे से अंदाज़ा नहीं होता,
शजर तो देखने में सब हरे मालूम होते हैं !

ज़रूरत से अना का भारी पत्थर टूट जात है,
मगर फिर आदमी भी अंदर-अंदर टूट जाता है !

मोहब्बत एक ऐसा खेल है जिसमें मेरे भाई,
हमेशा जीतने वाले परेशानी में रहते हैं !

फिर कबूतर की वफ़ादारी पे शक मत करना,
वह तो घर को इसी मीनार से पहचानता है !

अना की मोहनी सूरत बिगाड़ देती है,
बड़े-बड़ों को ज़रूरत बिगाड़ देती है !

बनाकर घौंसला रहता था इक जोड़ा कबूतर का,
अगर आँधी नहीं आती तो ये मीनार बच जाता !

उन घरों में जहाँ मिट्टी के घड़े रहते हैं,
क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं !

प्यास की शिद्दत से मुँह खोले परिंदा गिर पड़ा,
सीढ़ियों पर हाँफ़ते अख़बार वाले की तरह !!


-- Munawwar Rana



Munawwar Rana Maa Part 27


Hum saayadaar ped zamane ke kaam aaye,
Jab sukhne lage to jalane ke kaam aaye.

Koyal bole ya gaureyya achcha lagta hai,
Apne gaon mein sab kuch bhaiya achcha lagta hai.

Khandaani wirasat ke neelaam par aap apne ko taiyaar karte hue,
Us haweli ke sare makeen ro diye us haweli ko bazaar karte hue.

Udane se parinde ko shzar rok raha hai,
Ghar wale to khaamosh hain ghar rok raha hai.

Wo chahati hai ki aangan mein maut ho meri,
Kahan ki mitti hai mujhko kahan bulaati hai.

Numaaish par badan ki yun koi taiyaar kyon hota,
Agar sab ghar ho jaate to ye baazaar kyon hota.

Kachcha samajh ke bech na dena makaan ko,
Shayad kabhi ye sar ko chhupane ke kaam aaye.

Andheri raat mein aksar sunhari mishalein lekar,
Parindo ki musibat ka pata jugnoo lagate hain.

Toone saari baajiyaan jeeti hain mujhpe baith kar,
Ab main boodha ho raha hun astbal bhi chahiye.

Mohaaziro! yahi taareekh hai makaanon ki,
Banaane wala hamesha baraamdon mein raha. !!

हम सायादार पेड़ ज़माने के काम आये,
जब सूखने लगे तो जलाने के काम आये !

कोयल बोले या गौरेय्या अच्छा लगता है,
अपने गाँव में सब कुछ भैया अच्छा लगता है !

ख़ानदानी विरासत के नीलाम पर आप अपने को तैयार करते हुए,
उस हवेली के सारे मकीं रो दिये उस हवेली को बाज़ार करते हुए !

उड़ने से परिंदे को शजर रोक रहा है,
घर वाले तो ख़ामोश हैं घर रोक रहा है !

वो चाहती है कि आँगन में मौत हो मेरी,
कहाँ की मिट्टी है मुझको कहाँ बुलाती है !

नुमाइश पर बदन की यूँ कोई तैयार क्यों होता,
अगर सब घर हो जाते तो ये बाज़ार क्यों होता !

कच्चा समझ के बेच न देना मकान को,
शायद कभी ये सर को छुपाने के काम आये !

अँधेरी रात में अक्सर सुनहरी मिशअलें लेकर,
परिंदों की मुसीबत का पता जुगनू लगाते हैं !

तूने सारी बाज़ियाँ जीती हैं मुझपे बैठ कर,
अब मैं बूढ़ा हो रहा हूँ अस्तबल भी चाहिए !

मोहाजिरो! यही तारीख़ है मकानों की,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा !


-- Munawwar Rana



Munawwar Rana Maa Part 26

Use jali huyi lashein nazar nahi aati magar wo suee se dhaaga gujaar deta hai
Use jali huyi lashein nazar nahi aati,
Magar wo suee se dhaaga gujaar deta hai.

Wo peharon baith kar tote se baatein karta rehta hai,
Chalo achcha hai ab nazarein badalna seekh jaayega.

Use haalaat ne roka mujhe mere masaayal ne,
Wafa ki raah mein dushwaariyan dono taraf se hain.

Tujhse bichhada to pasand aa gayi betarteebi,
Isse pehale mera kamara bhi ghazal jaisa tha.

Kahan ki hizaratein, kaisa safar, kaisa juda hona,
Kisi ki chaah pairon mein duppata daal deti hai.

Ghazal wo sinf-e-naajuk hai jise apni rafaakat se,
Wo mahabooba bana leta hai main beti banaata hun.

Wo ek gudiya jo mele mein kal dukaan pe thi,
Dino ki baat hai pehale mere makaan pe thi.

Ladakpan mein kiye wade ki kimat kuch nahi hoti,
Anguthi haath mein rehti hai mangani toot jaati hai.

Wo jiske waaste pardesh jaa raha hun main,
Bichhadte waqt usi ki taraf nahi dekha. !!

उसे जली हुई लाशें नज़र नहीं आतीं,
मगर वो सूई से धागा गुज़ार देता है !

वो पहरों बैठ कर तोते से बातें करता रहता है,
चलो अच्छा है अब नज़रें बदलना सीख जायेगा !

उसे हालात ने रोका मुझे मेरे मसायल ने,
वफ़ा की राह में दुश्वारियाँ दोनों तरफ़ से हैं !

तुझसे बिछड़ा तो पसंद आ गई बेतरतीबी,
इससे पहले मेरा कमरा भी ग़ज़ल जैसा था !

कहाँ की हिजरतें कैसा सफ़र कैसा जुदा होना,
किसी की चाह पैरों में दुपट्टा डाल देती है !

ग़ज़ल वो सिन्फ़-ए-नाज़ुक़ है जिसे अपनी रफ़ाक़त से,
वो महबूबा बना लेता है मैं बेटी बनाता हूँ !

वो एक गुड़िया जो मेले में कल दुकान पे थी,
दिनों की बात है पहले मेरे मकान पे थी !

लड़कपन में किए वादे की क़ीमत कुछ नहीं होती,
अँगूठी हाथ में रहती है मंगनी टूट जाती है !

वो जिसके वास्ते परदेस जा रहा हूँ मैं,
बिछड़ते वक़्त उसी की तरफ़ नहीं देखा !!


-- Munawwar Rana



Munawwar Rana Maa Part 25


Kisi bhi mod par tumse wafadaari nahi hogi,
Humein maaloom hai tumko ye bimaari nahi hogi.

Neem ka ped tha barsaat thi aur jhula tha,
Gaon mein gujara jamaana bhi ghazal jaisa tha.

Hum kuch ase tere deedaar mein kho jaate hain,
Jaise bachche bhare baazaar mein kho jaate hain.

Tujhe akele padhoon koi hum sabak na rahe,
Main chahata hun ki tujh par kisi ka haq na rahe.

Wo apne kaandhon pe kunbe ka bojh rakhta hai,
Isiliye to qadam soch kar uthaata hai.

Aankhein to usko ghar se nikalne nahi deti,
Aansoo hai ki saamaan-e-safar baandhe hue hain.

Safedi aa gayi baalon mein uske,
Wo baaizzat ghrana chahata tha.

Na jaane kaun si majburiyan pardes laai thi,
Wah jitni der tak zinda raha ghar yaad karta tha.

Talaash karte hain unko jaruraton wale,
Kahan gaye wo purane sharafaton wale.

Wo khush hai ki baazaar mein gaali de di,
Main khush hun ehsaan ki kimat nikal aayi. !!

किसी भी मोड़ पर तुमसे वफ़ादारी नहीं होगी,
हमें मालूम है तुमको ये बीमारी नहीं होगी !

नीम का पेड़ था बरसात थी और झूला था,
गाँव में गुज़रा ज़माना भी ग़ज़ल जैसा था !

हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते हैं,
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं !

तुझे अकेले पढ़ूँ कोई हम सबक न रहे,
मैं चाहता हूँ कि तुझ पर किसी का हक़ न रहे !

वो अपने काँधों पे कुन्बे का बोझ रखता है,
इसीलिए तो क़दम सोच कर उठाता है !

आँखें तो उसको घर से निकलने नहीं देतीं,
आँसू हैं कि सामान-ए-सफ़र बाँधे हुए हैं !

सफ़ेदी आ गई बालों में उसके,
वो बाइज़्ज़त घराना चाहता था !

न जाने कौन सी मजबूरियाँ परदेस लाई थीं,
वह जितनी देर तक ज़िन्दा रहा घर याद करता था !

तलाश करते हैं उनको ज़रूरतों वाले,
कहाँ गये वो पुराने शराफ़तों वाले !

वो ख़ुश है कि बाज़ार में गाली मुझे दे दी,
मैं ख़ुश हूँ एहसान की क़ीमत निकल आई !!


-- Munawwar Rana



Sunday, 16 September 2018

Munawwar Rana Maa Part 24


Talwaar to kya meri nazar tak nahi uththi,
Us shakhs ke bachche ki taraf dekh liya tha.

Ret par khelte bachchon ko abhi kya maaloom,
Koi sailaab gharaunda nahi rehane deta.

Dhuaan baadal nahi hota ki bachpan daud padta hai,
Khushi se kaun bachcha karkhaane tak pahunchta hai.

Main chaahun to mithaai ki dukaane khol sakta hun,
Magar bachpan humesha raamdaane tak phunchata hai.

Hawa ke rukh pe rehane do ye chalana seekh jaayega,
Ki bachcha ladkhadayega to chalanaa seekh jaayega.

Ek sulgate shehar mein bachcha mila hansta hua,
Sehame-sehame-se charaagon ke ujaale ki tarah.

Maine Ek muddat se maszid nahi dekhi magar,
Ek bachche ka ajaan dena bahut achcha laga.

Inhen apni jarurat ke thikaane yaad rehate hain,
Kahan par hai khilauno ki dukaan bachche samjhte hain.

Zamaana ho gaya dange mein is ghar ko jale lekin,
Kisi bachche ke rone ki sadaayein roz aati hain. !!

तलवार तो क्या मेरी नज़र तक नहीं उठ्ठी,
उस शख़्स के बच्चों की तरफ़ देख लिया था !

रेत पर खेलते बच्चों को अभी क्या मालूम,
कोई सैलाब घरौंदा नहीं रहने देता !

धुआँ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है,
ख़ुशी से कौन बच्चा कारखाने तक पहुँचता है !

मैं चाहूँ तो मिठाई की दुकानें खोल सकता हूँ,
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है !

हवा के रुख़ पे रहने दो ये चलना सीख जाएगा,
कि बच्चा लड़खड़ाएगा तो चलना सीख जाएगा !

इक सुलगते शहर में बच्चा मिला हँसता हुआ,
सहमे-सहमे-से चराग़ों के उजाले की तरह !

मैंने इक मुद्दत से मस्जिद नहीं देखी मगर,
एक बच्चे का अज़ाँ देना बहुत अच्छा लगा !

इन्हें अपनी ज़रूरत के ठिकाने याद रहते हैं,
कहाँ पर है खिलौनों की दुकाँ बच्चे समझते हैं !

ज़माना हो गया दंगे में इस घर को जले लेकिन,
किसी बच्चे के रोने की सदाएँ रोज़ आती हैं !!


-- Munawwar Rana



Munawwar Rana Maa Part 23

Bachche-Village Children-Gaaon Ke Bachche

Farishte aa ke unke jism par khushboo lagate hain,
Wo bachche rail ke dibbe mein jo jhaadu lagaate hain.

Humakte khelte bachchon ki shaitaani nahi jaati,
Magar phir bhi humare ghar ki veeraani nahi jaati.

Apne mustkbil ki chaadar par rafoo karte huye,
Maszidon mein dekhiye bachche wajoo karte huye.

Mujhe is shehar ki sab ladkiyaan aadaab karti hain,
Main bachchon ki kalaai ke liye raakhi banaata hun.

Ghar ka bhojh uthaane wale bachche ki taqdeer na punchh,
Bachpan ghar se baahar nikalaa aur khilauna toot gaya.

Jo ashq goonge the wo arje-haal karne lage,
Humare bachche humin par sawaal karne lage.

Jab ek waakya bachpan ka humko yaad aaya,
Hum un parindo ko phir se gharon mein chhod aaye.

Bhare sheharon mein kurbaani ka mausam jab se aaya hai,
Mere bachche kabhi holi mein pichkaari nahi laate.

Maszid ki chataai pe ye sote hue bachche,
In bachchon ko dekho kabhi resham nahi dekha.

Bhookh se behaal bachche to nahi roye magar,
Ghar ka chulha muflisi ki chugliyaan khaane lagaa. !!

फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर ख़ुशबू लगाते हैं,
वो बच्चे रेल के डिब्बे में जो झाड़ू लगाते हैं !

हुमकते खेलते बच्चों की शैतानी नहीं जाती,
मगर फिर भी हमारे घर की वीरानी नहीं जाती !

अपने मुस्तक़्बिल की चादर पर रफ़ू करते हुए,
मस्जिदों में देखिये बच्चे वज़ू करते हुए !

मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं,
मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ !

घर का बोझ उठाने वाले बच्चे की तक़दीर न पूछ,
बचपन घर से बाहर निकला और खिलौना टूट गया !

जो अश्क गूँगे थे वो अर्ज़े-हाल करने लगे,
हमारे बच्चे हमीं पर सवाल करने लगे !

जब एक वाक़्या बचपन का हमको याद आया,
हम उन परिंदों को फिर से घरों में छोड़ आए !

भरे शहरों में क़ुर्बानी का मौसम जबसे आया है,
मेरे बच्चे कभी होली में पिचकारी नहीं लाते !

मस्जिद की चटाई पे ये सोते हुए बच्चे,
इन बच्चों को देखो, कभी रेशम नहीं देखा !

भूख से बेहाल बच्चे तो नहीं रोये मगर,
घर का चूल्हा मुफ़लिसी की चुग़लियाँ खाने लगा !!


-- Munawwar Rana